Wednesday, 21 May 2014

जीबन की गाड़ी

जीबन की गाड़ी चलती जाती है अपनी मस्त मगन से
ना रुकता है किसीके लिए ना थेरेता है किसीकी के लिए
वो तो अपनी धून गति चली जाती है
जीबन की गाड़ी चलती जाती है.....

जीबन की रहो में मिलते है  दोस्त कुच्छ  पलके लिए
वादे करते हैं साथ में संग चलने के लिए लेकिन
जब मंजिल आ जाती है तब कोई ना सत्ता होता है
ना कोई साथ आगे जाने के लिए इन्तेजार करता है
फिर बी जीबन गाड़ी चलती जाती है.....

जीबन की रहो में आतें है बहुत सारे इंसान
और मिलते है बहुत सारे इंसान खुद को
बिना मतलब से हमारे ऊपर कुर्बान व्हो जाते को
लेकिन उसके बदले ना हम उनके ऊपर खुद को
 कुरबान कर पाते है ना उनके लिए  हम थेर पाते हैं
फिर बी जीबन की गाड़ी चलती जाती है.......

हम तो अकेले चले हैं जा रहें है अपनी मंज़िल
की तरफ पता नही कब आएगी मेरी मंज़िल
सुखी पड़ी है जीबन की रस्ते  कब मिलेगी
उसको अपनी आशाओं की पानी इसी बात
को सोचा करे के  जीबन की गाड़ी चलती जाती है.....

                                       फिर बी जीबन की गाड़ी चलती जाती है............

Monday, 19 May 2014

ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ

ଆଶୁରେ ଅନ୍ଧାର ଆଶୁରେ ଯେତେ ରାତି 
ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି
ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି
ଆଶୁରେ ଅନ୍ଧାର .....

ଏଇ ଦ୍ବୀପ ଶିଖା ,ବିଜୟ ଟିକା
ଆଜି ପରଣେ ପରଣେ ହୁଏ ଲେଖା
ଏଇ ଦ୍ବୀପ ଶିଖା ,ବିଜୟ ଟିକା
ଆଜି ପରଣେ ପରଣେ ହୁଏ ଲେଖା
ମରିବାକୁ ଯିଏ କେବେ ଡରି ନାହି
ମରିବାକୁ ଯିଏ କେବେ ଡରି ନାହି
ସିଏ  ମରି  ନାହି ,କି ମରି ପାରେ ନାହି.......

ଆଲୋକିତ କରି ଏଇ ଗାଁ ମାଟି 
ଆଲୋକିତ କରି ଏଇ ଗାଁ ମାଟି
ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି
ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି
ଆଶୁରେ ଅନ୍ଧାର ......

ସ୍ନେହ ମମତା ପୁର୍ନ୍ୟା ସେ ନଈ
ଆଜି ସବୁ ପାପ ଦେଇଚି ରେ ସେ ଧୋଇ 
ସ୍ନେହ ମମତା ପୁର୍ନ୍ୟା ସେ ନଈ
ଆଜି ସବୁ ପାପ ଦେଇଚି ରେ ସେ ଧୋଇ 
ବିଷ  କୁ ପିଉଚ,ପି  ହରି ପାରେ ଯିଏ 
କୋଟିଏ  ଭିତରେ ମଣିଷ ଗୋଟେ 
ଏଇ ଗାଁ ମାଟିର 
ଅନ୍ଧାର ଲୁଚେଇ ଜଳୁ ଥିବ ନିତି 
ଏଇ ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି........
ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି...

ଆଶୁରେ ଅନ୍ଧାର ଆଶୁରେ ଯେତେ ରାତି 
ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି

ଜଳୁ ଥିବ ନିତି ଅଲିଭା ଦ୍ବୀପ ଟି....